

विभागाध्यक्ष एवं शोध निदेशक – वाणिज्य
शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मंदसौर (म.प्र.)
सनातन धर्म में अक्षय तृतीया का बहुत महत्व होता है। इस दिन मां लक्ष्मी की विशेष पूजा आराधना करने पर घर खुशियों और धन-दौलत से भर जाता है। अक्षय तृतीया को अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन किसी विशेष विचार किए कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य किए जा सकते है। जिनके सामान्य लग्न नहीं मिले बनते, वे भी इस दिन विवाह कर सकते है। अबूझ मुहूर्त में समय स्वयं सिद्ब मुहूर्त शुभ माना जाता है। यूँ कहे कि अक्षय का अर्थ है– जिसका क्षय न हो इसलिए इस दिन किए गए जप, तप, पूजा और सत्कर्म का फल स्थायी माना जाता है।
19 अप्रैल को प्रातः 10:30 बजे से इसका मुहूर्त प्रारंभ होता है। स्वयं सिद्ध मुहूर्त में पूरे दिन सोना, चांदी, वाहन या संपत्ति की खरीदारी की जा सकती है। इसके लिए कोई विशेष समय देखने की आवश्यकता नहीं होती । इस दिन नमक खरीदने से घर की द्ररिद्रता और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है । इस दिन नमक दान करने से परिवार में सुख शांति बनी रहती हैं। यह पवित्र दिन होने के कारण , इस दिन तामसिक प्रवृत्ति की चीजों का सेवन करने से वंचित रहना चाहिए। इस दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ और त्रैतायुग का आरंभ हुआ। इस दिन दिया गया दान अक्षय रहता है , जबकि पाप-पुण्य दोनों का फल भोगना पड़ता है। जलघर व फल दान का विशेष विधान है। शुभ कार्यो पर विशेष जोर इस दिन किया जाता है।
शास्त्रों के अनुसार इसदिन किसी भी नए काम की शुरुआत करने से समॄद्बि आती है। पुराणों में उल्लेख है, कि अक्षय तृतीया के दिन गंगा माँ स्वर्ग से मृत्युलोक में अवतरित हुई थी । धार्मिक मान्यता है , कि सत्य त्रैता ओर द्वापर युग इन सभी की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन से हुई थी। वैदिक शास्त्रों के अनुसार अक्षय तृतीया एक अत्यंत शुभ अवसर माना जाता है । इस दिन कोई भी शुभ कार्य किया जाता है। इससे जुडी़ कई कहानियाँ जो सनातन धर्म और जैन धर्म से जुड़ी हुई है । अक्षय तृतीया जैन धर्म में अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक दिन माना गया है। यह प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) की तपस्या और उनके प्रथम आहार की याद दिलाता है। जैन धर्म के अनुसार इस दिन को वषीऀतप तप के पारणे से जोड़ा गया है । पालीताणा और हस्तिनापुर की कहानी भी इस दिन से जुड़ी हुई है।
एक कथा है– कि एक बार पांचों पाडव और उनकी पत्नी द्रोपदी अज्ञातवास में थे। उन्हे ऋषि दुर्वासा ने संदेश भिजवाया कि वे भोजन करने आ रहे है। पांडवों के पास ऋषि को भोजन कराने के लिए अन्न का एक दाना भी नहीं’ था। द्रोपदी ने भगवान श्रीकृष्ण से इस समस्या के समाधान के लिए प्रार्थना की। श्रीकृष्ण वहाँ आए। उन्होंने देखा कि भोजन पात्र में चावल का एक दाना है। उन्होंने उस दाने को उठाकर खा लिया और वह पात्र “अक्षय पात्र” बन गया। अक्षय अर्थात ‘वह, जिसका कभी क्षय नहीं होता। जब ऋषि दुर्वासा शिष्यों के साथ भोजन के लिए आए, द्रोपदी ने उसी अक्षय पात्र से सभी को भोजन कराया। वे पात्र से जितना भोजन निकालती, उससे उतना ही ओर भर जाता था।
अक्षय पात्र वह व्यक्ति होता है, जो दान देने में उदार होता है, और हमेशा दूसरों की सहायता करता है। इस संबंध में सुदामा और श्री कृष्ण की मित्रता की कहानी विख्यात थी। सुदामा श्रीकृष्ण को चावल दिए कृष्ण ने प्रेम से उन्हें खाए और जब सुदामा घर पहुंचे तो उनका घर धन-धान्य से भरा हुआ था।
इस पवित्र दिन को उत्तराखंड में गंगोत्री और यमुनोत्री के मंदिरों के कपाट खोले जाते हैं , जिसके साथ ही चार धाम की यात्रा पूर्ण रूप से शुरुआत हो जाती है। ऐसा माना जाता है, कि जो व्यक्ति इन तीर्थ के दर्शन करता है। उसे अवश्य ही मोक्ष की प्राप्ति होती है । अक्षय तृतीया का पर्व *व्यक्ति को व्यष्टि से समष्टि बनाने की प्रेरणा देती है*। और ऐसी ही प्रेरणा उसे मिलती भी है।