हम तीन सहेलियां तीन किलोमीटर पैदल चलकर रोजाना स्कूल देर से पहुँचती थीं : पद्मश्री सुधा वर्गीज, समाजसेविका एवं संस्थापिका ‘नारी गुंजन’

हम तीन सहेलियां तीन किलोमीटर पैदल चलकर रोजाना स्कूल देर से पहुँचती थीं : पद्मश्री सुधा वर्गीज, समाजसेविका एवं संस्थापिका ‘नारी गुंजन’

मैं केरल के कोट्ट्यम जिले की रहनेवाली हूँ. हमलोगों के पास कुछ जमीनें थीं तो पिताजी खेती-बाड़ी करते थें. मैं तीन भाई-बहन हूँ जिनमे मैं ही सबसे बड़ी हूँ. मेरी स्कूलिंग केरल के संत मैरी स्कूल से हुई. हम तीन सहेली सहेलियां एक साथ पढ़ने निकलती थीं, स्कूल जाने के लिए 3 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था. और स्कूल जाने -घर लौटने के दौरान कम से कम 6 किलोमीटर चलना पड़ता था. इतनी दूर पैदल जाने की वजह से हर रोज हमलोग स्कूल लेट पहुँचते थें. प्रिंसिपल रोज बोलतीं – “अगले दिन लेट आएगी तो मार खायेगी.” लेकिन हमलोग फिर नहीं चाहते हुए भी अक्सर लेट हो जाते थें. एक-दो बार मार भी खानी पड़ी. अंत में स्कूलवाले समझ गए कि हमलोग 3 किलोमीटर चलकर थके-हारे स्कूल तक पहुँचते हैं. इसलिए उन्होंने हमे इस विषय पर बोलना छोड़ दिया.

 

‘कौन बनेगा करोड़पति’ में सुधा वर्गीज

हम स्कूल देर आते जरूर थें लेकिन पढ़ने में काफी मेहनत करते थें. हम कभी स्कूल में फेल नहीं हुए. अभी की तरह जैसे बच्चों को कुछ पैसा मिलता है कि वो बाहर तरह-तरह की चीजें खा सकें वैसा हमलोगों के समय में कुछ नहीं था. हमलोगों के हाथ में कभी पैसा नहीं रहता था. तब हमारे यहाँ कल्चर नहीं था कि हर दिन बाहर से खरीदकर खाना है इसलिए हम मांगते भी नहीं थें. हमलोग रोजाना घर से टिफिन लेकर जाते थें और एक साथ मिलकर खाते थें. स्कूल के दिन बड़े मस्ती में गुजरे. मैं खेल-कूद में उतनी अच्छी नहीं थी. लेकिन गाने-डांस में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी. उसमे मन भी लगता था और मुझे इनाम भी मिलते थें. मैं घर में सबसे बड़ी थी तो मुझे घर के काम में भी माँ की थोड़ी बहुत हेल्प करनी पड़ती थी.

 

 ‘नारी गुंजन महिला बैंड’ के साथ सुधा जी

मैट्रिक इक्जाम देने के बाद ही मैं हमेशा के लिए बिहार चली आयी. मुझे बिहार आने की इच्छा इसलिए थी क्यूंकि मैं यहाँ के गरीबों की स्थितियां जानना चाहती थीं कि किस हालात तक गरीबी है इधर. एक तरह से मेरा यह रिसर्च वर्क भी था. तब अख़बार में पढ़े थें कि इधर गरीबी बहुत ज्यादा है. केरल के ही न्यूज पेपर में दिया था कि 10-12 लड़कियों-महिलाओं का एक ग्रुप बिहार जा रहा है वहां के गरीब लोगों से मिलने तो फिर मैं वो न्यूज पढ़कर उनलोगों से मिली और उनके ग्रुप में शामिल होकर 1965 में बिहार चली आयी. जब कम उम्र में मैं घर छोड़कर आ रही थी तो घर में बहुत रोक-टोक हुआ. वे नहीं चाहते थें कि मैं बिहार जाऊं. लेकिन मैंने बोला- “हमको जाना है बिहार, देखना है, कुछ काम करने की वहां जरूरत है.” मुश्किल था उनको मनाना फिर वे मेरे जिद करने पर मान गए. जब मैं पहली बार बिहार आयी तो रिसर्च करते और यहाँ रहते हुए ही मुंगेर जिले के एक कॉलेज से मैंने 12 वीं की पढ़ाई पूरी की. घरवाले बुलाते तो मैं कहती अगर मुझे यहाँ अच्छा नहीं लगा तो मैं आ जाउंगी. फिर यहीं से मैं स्नातक की पढ़ाई करने मैसूर, कर्नाटक चली गयी. हिस्ट्री में मैंने ऑनर्स किया. कॉलेज में ऑनर्स के लिए सिर्फ 6 स्टूडेंट थें. कॉलेज में भी कल्चरल प्रोग्राम में मैं पार्टिशिपेट करती थी. चूँकि इंग्लिश मेरा फेवरेट सब्जेक्ट था इसलिए कभी-कभी डिबेट और स्पीच कम्पटीशन में हिस्सा लेकर प्राइज लाती थी. एक बार हमलोग आउटिंग के लिए तमिलनाडू के मरीना बीच गए. हमलोगों का 6 लोगों का छोटा सा ग्रुप था इसलिए सभी टीचर्स भी हमे जानते थें. हमलोग भी एक-दूसरे को बहुत नजदीक से जानते थें. एक साथ खाना, पढ़ना, घूमना सब संग-संग होता था.

‘नारी गुंजन’ छात्रावास की दलित बच्चियों के साथ सुधा वर्गीज

पटना, बिहार में रहने के दौरान कुछ समय के लिए मैंने नॉट्रेडेम स्कूल में टीचिंग भी शुरू किया. मैंने देखा कि स्कूल में सिर्फ स्टैंडर्ड और अच्छी सोसायटी के बच्चे आते हैं. कोई गरीब का बच्चा वहां नहीं जा सकता था. क्यूंकि ऐसे स्कूल उनकी पहुँच में नहीं थें. और चूँकि मैं ऐसे ही संम्पन बच्चों को पढ़ाने के लिए या उनके साथ रहने के लिए नहीं आयी थी इसलिए मैंने स्कूल छोड़ दी. उसके बाद मैं पूरा समय गरीब-वंचित लोगों के साथ बिताना चाहती थी. उसके लिए हम मौका खोजते रहें, मौका मिला तो मैं उनके बीच जाकर रहने लगी. शुरुआत में काफी दिक्कत हुई. मैं उनकी लोकल भाषा नहीं जानती थी. लेकिन लोगों के साथ रहते-रहते खासकर वैसी महिलाओं के बीच रहते हुए मैंने उनकी लैंग्वेज सीख ली और फिर दानापुर के गांव में रहना शुरू किया. केरल में हम हिंदी सेकेण्ड लैंग्वेज के रूप में पढ़े थें लेकिन बोलना नहीं जानते थें. इधर रहते-रहते पहले हिंदी फिर जो वे लोग मगही बोलते थें वो भी सीख लिए ताकि उन लोगों के साथ कम्युनिकेट कर सकूँ. तब मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं वकालत की डिग्री लेती हूँ तो मेरे इस काम में और बेहतरी आएगी. तब मैंने बैंगलोर जाकर लॉ की पढ़ाई की.

 

भूतपूर्व राष्ट्रपति स्व. अब्दुल कलाम जी के हाथों पद्मश्री पुरस्कार लेती हुईं सुधा वर्गीज

1986 में मैंने ‘नारी गुंजन ‘संस्था की शुरुआत की तब मेरी उम्र 35 साल के आस-पास थी. मैं ज्यादा समय गरीब महिलाओं के बीच रहती थी और उनकी समस्याएं सुनती थी कि उनके साथ क्या होता है और उनकी क्या परेशानियां हैं. तब वे लोग तीन प्रतिशत भी शिक्षित नहीं थें. उन लोगों को बहुत सारी चीजों का ज्ञान नहीं था. उनकी समस्या एक तो घरेलू हिंसा थी, उसके बाद कास्ट प्रॉब्लम भी थी. तो मेरे प्रिफरेंस में दलित महिलाएं थीं. मैं दलित समाज के बीच में ज्यादा काम करना पसनद करती थी. मेरी संस्था का काम था दलित महिलाओं में अवेयरनेस लाना, उन्हें आत्मनिर्भर बनाना. खुद मेरा क्या अधिकार है उनको मालूम नहीं था. पतृसत्तात्मक समाज में घर-परिवार में उनके साथ जो भी जुल्म होता वे सहते रहती थीं. तो उनको सशक्त बनाने का मैंने काम शुरू किया. बिहार में मेरा जो फिल्ड वर्क था बहुत रिस्की था. 21 साल मैं मुसहर बस्ती में रही उन्ही लोगों के साथ. उनलोगों को कोई भी प्रॉब्लम होती मैं साथ देती. मेरे सपोर्ट करने से कुछ बड़े जात के लोगों को अच्छा नहीं लगा तो उनकी तरफ से फिर मुझे जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं, मुझे वहां से भगाने की कोशिश भी की गयी. मैं उनसे डरती तो थी लेकिन मैंने कभी डर को सामने प्रकट नहीं होने दिया और ना वहां से भागी. मैं तब जमसौत गांव में अकेली एक झोपडी में रहती थी. मैं खाना-पीना वहां खुद से ही बनाती थी. बड़े लोग इस बात पर नाराज थें कि अगर ये दलित पढ़-लिख गए तो उनका भैंस कौन चऱायेगा, उनका खेत कौन जोतेगा..? फिर मैंने दलितों को जागरूक करना शुरू किया कि आपलोग उनके जाल में नहीं फंसें, ये सब आपलोगों को एक तरह से चूसने का काम कर रहे हैं. दबाव डालकर जबरदस्ती बंधुआ मजदूर बनाये हुए हैं. दलित महिलाओं के साथ बदसलूकी भी की जाती थी. तो सब आवाज उठाकर के एक साथ उनका विरोध करते थें. मेरी झोंपड़ी के बगल में ही चापाकल था और वहां से पानी भरकर लाना, खुद खाना बनाना मेरे लिए साधारण चीज थी. तब वहां रहने के दौरान स्थानीय दलित लोग अपने मन से सब्जी-आलू जो मिलता कुछ हमारे लिए ले आते थें. थोड़ा बहुत चावल खरीदना पड़ता था. दिनभर हमारे पास महिलाओं-बच्चों का जमावड़ा लगा रहता था.

 

‘बोलो ज़िन्दगी’ के साथ अपने संस्मरण साझा करती हुईं पद्मश्री सुधा वर्गीज

 

उनलोगों के साथ बहुत समस्याएं थीं. कास्ट के चलते आये दिन उनके साथ इधर-उधर मारपीट होती थी. ये पहले देशी शराब का धंधा करते थें. बड़े लोग इनके पास शराब पीने आते थें और फिर वहां अलग समस्या खड़ी हो जाती थी. शराब के नशे में बड़े जातवाले ग्राहक इनकी महिलाओं-लड़कियों के साथ रेप कर देते थें. उन सब चीजों को देखकर हम सबने मिलकर लड़ाई लड़ी. इनलोगों के केस लड़ने मैं दानापुर सिविल कोर्ट भी जाती थी. मैं वहां कोर्ट में बैठती तो कोई मुझे कुछ और भी काम दे देता तो मैं करती थी. कुछ पैसे उधर से मिल जाते थें. सिविल कोर्ट में मैंने 4-5 साल काम किया. हमने 8-9 रेप केस लड़ें. हम एक बार जो बिहार आये तो फिर काम में ही रच-बस गए, सारा समय काम में चला गया इसलिए मेरा लगाव भी कभी घर बसाने का, शादी करने का नहीं हुआ. घरवाले जानते थें कि मेरा अपना एक लक्ष्य है, प्लान है. एक वक़्त मेरा भाई हमसे बोला कि यदि कोई भी समय आपको बिहार में अच्छा ना लगे तब तुरंत वापस केरल आ जाना. जब मेरे माँ-पिताजी जीवित थें तो उन्हें देखने-मिलने मैं केरल हर साल जाती थी लेकिन अब जब वे नहीं हैं तो मैं अब वहां बहुत कम जाती हूँ.

 

 

 

बिहार में दलित बस्ती में रहते हुए उन दिनों मैंने पाया कि मुसहर जाती के लड़के कोई काम नहीं करते हैं. सारा दिन कहीं निठल्ले पड़े रहते. सुबह-सबेरे ही शराब पीकर ताश खेलते, झगड़ा-झंझट करते रहते थें. तो धीरे-धीरे इन्हे एक लक्ष्य की ओर ले जाने के लिए हमलोगों ने कई दिन उनसे बातचीत किया, तो अंत में वे बोले कि हमलोग क्रिकेट खेलेंगे. पुनपुन, बिहटा और फुलवारीशरीफ ये तीन ब्लॉक में मुख्य रूप से अभी हमारा 16-17 क्रिकेट टीम है 350 लड़कों का. दो टूर्नामेंट भी हो चुके हैं अबतक. इससे उनमे बहुत परिवर्तन आया. उनकी बुरी संगत में कमी आयी और समय बर्बाद करना छूट गया. बहुत लड़के जो 7वीं-8 वीं में पढ़ाई छोड़ दिए थें वे फिर से पढ़ने लगें. काम-धंधे के रूप में छोटा-मोटा दुकान भी शुरू किये. अब उनकी लाइफ स्टाइल थोड़ी चेंज हुई है. ये लोग मुझे प्यार से सायकिल वाली दीदी बोलते हैं और मुझे अपना मानते हैं. यंग एज से ही इनके बीच रहते हुए, इनके लिए काम करते हुए मुझे कभी भी अकेलापन महसूस नहीं हुआ. अब तो यही मेरा परिवार है.

About The Author

Rakesh Singh Sonu

'Bolo Zindagi' s Founder & Editor Rakesh Singh 'Sonu' is Reporter, Researcher, Poet, Lyricist & Story writer. He is author of three books namely Sixer Lalu Yadav Ke (Comedy Collection), Tumhen Soche Bina Nind Aaye Toh Kaise? (Song, Poem, Shayari Collection) & Ek Juda Sa Ladka (Novel). He worked with Dainik Hindustan, Dainik Jagran, Rashtriya Sahara (Patna), Delhi Press Bhawan Magazines, Bhojpuri City as a freelance reporter & writer. He worked as a Assistant Producer at E24 (Mumbai-Delhi).

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