रक्षाबंधन विशेष : जिन बहनों के भाई नहीं हैं वे रक्षाबंधन कैसे Celebrate करती हैं❓

रक्षाबंधन विशेष : जिन बहनों के भाई नहीं हैं वे रक्षाबंधन कैसे Celebrate करती हैं❓

3 अगस्त, रक्षाबंधन के दिन वैसे भाई-बहनों की पीड़ा को समझा जा सकता है जिनकी सगी बहन या जिनके भाई नहीं हैं. बचपन में उन्होंने जब होश संभाला तो दूसरे भाई-बहनों को संग देखकर उनकी क्या मनोस्थिति रही होगी, कैसे वो लम्हें गुजारे गए होंगे❓ इन्ही ख्यालातों से रूबरू होने के लिए आज Bolo Zindagi ने बात की पटना की वैसी कुछ बहनों से जिनके अपने भाई नहीं हैं. यहाँ प्रस्तुत हैं उनके जीवन के खट्टे-मीठे रोचक अनुभव…..

📌 विभा देवी, मुखिया – हमलोग 5 बहन हैं, हमारा कोई भाई नहीं था. सबसे बड़े हम ही हैं. रक्षाबंधन के दिन हम पाँचों बहनें बहुत उदास रहती थीं, मम्मी से पूछते कि हमलोगों का कोई भाई क्यों नहीं है और फ़िर हमलोग बहुत रोते थें. मेरे घर के बगल में एक मजदूर का परिवार था तो उनके ही बेटे को हमलोग जाकर राखी बांध आते थें. और जब उस बच्चे के मजदूर पिता पूछते कि, तुमलोगों को क्या चाहिए? तो हमलोग कुछ बोल नहीं पाते थें क्योंकि बुरा लगता था कि दूसरे से क्या मांगें. फ़िर घर आने के बाद हमलोग सारी बहनें अपने में बातें करते थें कि आज अगर हमारा भाई होता तो हमलोग लड़ झगड़ के अपनी पसंद का कुछ गिफ़्ट लेतें.

 

 

 

 

 

               विभा जी अपनी छोटी बहन के साथ

 

 

उसके अलावा हमने तब किसी और को राखी नहीं बांधा है. शादी के बाद एक व्यक्ति मेरे मुंहबोले भाई बन गयें तो हम उनको ही हर साल राखी बांधने लगें. लेकिन फिर भी रक्षाबंधन के दिन बहुत अफ़सोस होता है, मन में बहुत दुःख होता है कि काश! हमारा एक सगा भाई भी होता.

 

 

 

 

 

 

📌सोनी कच्छप, ट्रैफिक कॉन्स्टेबल, जे.पी. गोलंबर, पटना – हम चार बहनें हैं जिनमे सबसे बड़ी मैं ही हूँ. पिता जी के असमय देहांत के बाद पूरे घर-परिवार की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर ही आ गयी इसलिए मैं अपनी छोटी बहनों की परवरिश, पढ़ाई और ब्याह-शादी कराते हुए उनकी खुशियों को पूरा करने के क्रम में कब उनका भाई बन गयी पता ही नहीं चला. फ़िर भी मुझे एक भाई की कमी खलती थी.

 

 

 

 

 

 

जब राखी का दिन आता था तो मुझे लगता था कि काश अगर मेरा भी भाई होता तो मैं भी उसे हर रक्षाबंधन के दिन और बहनों की तरह सुबह उठकर पूजा करती और अपने भाई को राखी बांधती, उससे गिफ़्ट मांगती. भगवान से उसकी लम्बी उमर की दुआ करती. कोई अपना भाई तो नहीं है फ़िर भी बुआ के बेटे को राखी बांधती हूँ तो भाई नहीं होने का ग़म हल्का हो जाता है.

 

 

 

 

 

 

 

📌कोमल कश्यप, म्यूज़िक ऑनर्स, ग्रेजुएशन, पार्ट 3 – मैं तीन बहन हूँ मेरा कोई भाई नहीं है, घर में सबसे छोटी होने के कारण बचपन से ही ऐसा लगता था कि मेरा कोई भाई क्यों नहीं है? माँ बताती हैं कि मैं रक्षाबंधन वाले दिन बहुत रोया करती थी कि मेरा भाई कहाँ है? मुझे लाके दो. दूसरे भाई बहनों को देख के अंदर से मुझे अजीब लगता था कि काश मेरा भी अपना भाई होता तो उसे मैं राखी बांधती, वो मेरी रक्षा करने का वादा करता. एक बड़ा भाई होता मेरा. जब मैं सयानी हुई तो लगता है कि चलो कोई बात नहीं अपना ना सही मुँह बोले भाई और भईया कहने वाले मेरे अपने भाई की तरह कुछ लोग ज़रूर हैं, जो हर तरह से मेरे लिए सब करने को हमेशा तैयार रहते हैं, जिनको मैं अब अपना मान के राखी बांधती हूँ, वो भी इसलिए क्योंकि उनकी भी कोई अपनी बहन नहीं है, इसलिए आज एक अपने भाई बहन होने का रिश्ता बना है, उन्हें भी रक्षाबंधन के दिन बहन की कमी महसूस होती होगी, जिस तरह मुझे भाई की होती है.

 

 

कोमल अपनी दोनों बड़ी बहनों के साथ

मुझे इस बात की खुशी है कि खून का रिश्ता ना होते हुए भी लोग दिल से रिश्ता निभाते हैं. छोटी थी तो राखी के दिन मौसी के बेटे, चाची के बेटे, आस पड़ोस के बच्चे आ जाते थे तो वो भी अच्छा लगता था कि चलो भाई लोग आ गयें,अब राखी बांधेंगे लेकिन सही मायने में अब सोचती हूँ तो कहीं ना कहीं ऐसा लगता है कि फिर भी कितना भी क्यों ना हो अपनेपन वाला भाव नहीं आता, एक भाई की कमी ज़रूर खलती है क्योंकि ख़ुद का भाई होता तो उससे हक़ से कुछ भी मांग सकती थी, बोल सकती थी बेझिझक, लड़ झगड़ के. मेरे माँ पापा ने कभी भाई की कमी महसूस नहीं होने दी, हमेशा किसी ना किसी तरह मनाते हुए राखी वाले दिन भी खुश कर देते थे, इसलिए हम तीनों बहन अब बड़े हुए हैं तो एक दूसरे को ही राखी बांधकर रक्षाबंधन का त्यौहार मनाते हैं इस विश्वास के साथ कि हमेशा एक दसूरे की ऐसे ही फ़िक्र करेंगे, एक दूसरे का साथ देंगे.

 

 

 

 

 

 

📌श्रुति सिन्हा, बैंकिंग सर्विस – मेरा कोई भाई-बहन नहीं है, मैं घर में एकलौती हूँ. बचपन में किसी को भी राखी बांध लेते थें क्योंकि उस वक़्त समझ नहीं थी इसलिए कोई दुःख नहीं होता था कि मेरा अपना कोई भाई नहीं है. फिर जैसे जैसे बड़ी होती गयी एहसास होने लगा तो मैं एक दिन मम्मी से पूछी कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ, मेरे नसीब में भाई क्यों नहीं है? तब मम्मी समझाई कि, “कोई बात नहीं बेटा, सभी को सबकुछ नहीं मिलता है.” लेकिन माँ-बाप तो आपको सिर्फ़ समझा ही सकते हैं ना, असल में इस बात पर क्या फील होता है वो तो बच्चे ही बख़ूबी समझ सकते हैं. तब बचपन की राखी और अभी की राखी में मुझे फ़र्क नज़र आने लगा, हर रक्षाबंधन पर गहराई से महसूस करने लगी अपना भाई ना होने की टीस. जब भी मैं दूसरी सहेलियों को राखी के दिन देखती कि वो लोग कितना ख़ुश हैं, अपने भाइयों के साथ रहती हैं, कुछ भी हुआ तो आपस में सुख-दुख साझा कर सकते हैं, वो मुझे नसीब नहीं हो सकता कभी. पहले से मैं रक्षाबंधन पर 5-6 लड़कों को राखी बांधती रही हूँ, लेकिन इसबार कोरोना के चलते सिर्फ दो लोगों को ही राखी बांधूंगी. अब यही मेरे भाई हैं और उनके लिए यही दुआ करती हूँ कि वो खूब नाम कमायें और समाज में नेक काम करें.

 

 

 

 

 

 

📌पूजा, CA Final Student – मेरा अपना कोई भाई नहीं है, हम तीन बहन हैं लेकिन कभी भाई की कमी महसूस नहीं हुई क्योंकि हम तीनों बहनें बचपन से ही अपनी बुआ के बेटे को राखी बांधती हैं. कभी ऐसा लगा नहीं कि मेरा अपना सगा कोई भाई नहीं है.

 

 

 

  पूजा अपनी छोटी दोनों बहनों के संग

 

 

 

हम इस दिन की शुरुआत गणेश भगवान को राखी बांधकर करते हैं. इस दिन प्लस पॉइंट ये होता है कि फुफेरे भाई के अलावा मम्मी-पापा से भी हमलोगों को मनपसंद गिफ़्ट मिल जाता है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

📌आस्था, क्लास 11th – जब कभी रक्षाबंधन आता है मुझे बुरा नहीं लगता कि मेरा भाई नहीं है. क्योंकि मैं अपनी माँ को ही अपना सबकुछ मानती हूँ. इसलिए मैं उसे ही राखी बांधती हूँ. माँ ने कभी मुझे इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि मेरा कोई भाई नहीं है.

 

 

 

 

 

 

 

       आस्था अपनी माँ के साथ

 

 

यह सही है कि मेरे जीवन में कुछ रिश्तों का अभाव है फ़िर भी मुझे माँ-पापा, भाई-बहन सभी का प्यार माँ से ही मिलता है.

 

 

About The Author

Rakesh Singh Sonu

'Bolo Zindagi' s Founder & Editor Rakesh Singh 'Sonu' is Reporter, Researcher, Poet, Lyricist & Story writer. He is author of three books namely Sixer Lalu Yadav Ke (Comedy Collection), Tumhen Soche Bina Nind Aaye Toh Kaise? (Song, Poem, Shayari Collection) & Ek Juda Sa Ladka (Novel). He worked with Dainik Hindustan, Dainik Jagran, Rashtriya Sahara (Patna), Delhi Press Bhawan Magazines, Bhojpuri City as a freelance reporter & writer. He worked as a Assistant Producer at E24 (Mumbai-Delhi).

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