पर्यावरण के संतुलन में मुख्य किरदार ऑक्सीजन का होता है : 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष

पर्यावरण के संतुलन में मुख्य किरदार ऑक्सीजन का होता है : 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष

हमारे अलावा कई तरह के जीव-जंतु , वनस्पतियां आदि इस पृथ्वी पर निर्भर हैं। पृथ्वी की प्राकृतिक पर्यावरण को बनाए रखने में इन सभी का योगदान होता है । इसलिए यह आवश्यक है, कि हमारा व्यवहार संयमित व ऐसा संतुलित हो जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।

डॉक्टर. बी.आर. नलवाया, 5, जैन कालोनी, मन्दसौर, (म.प्र.) – 458001

पर्यावरण हमारे जीवन का आधार है ,पर्यावरण की समुचित जानकारी पर्यावरण के अध्ययन से ही मिलती है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन जागरूकता बहुत आवश्यक है। निश्चित ही मनुष्य जीव-जंतु एवं पेड़- पौधों सभी को स्वस्थ जीवन व्यतीत करने के लिए स्वस्थ पर्यावरण की आवश्यकता महसूस होती है। वैसे तो पृथ्वी पर विद्यमान प्रत्येक तत्व महत्वपूर्ण होता है , फिर भी वायु के बिना कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता । अतः श्वास के लिए शुद्ध वायु का पर्याप्त होना भी अत्यंत आवश्यक है। देखा गया विश्व में 90 प्रतिशत देशों में प्राण वायु दुषित हो चुकी है। इसमें भारत का नंम्बर प्रथम स्थान बन गया है। हमारी राजधानी दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी है। यूनिसेफ की रिपोर्ट में कोरोना काल में महामारी के चलते जब अपेक्षाकृत कम प्रदूषण था। फिर भी दुनिया में 84 लाख मौते वायु प्रदूषण के कारण हुई, जिसमें 21 लाख मौतें भारत में हुई। यदि यही हाल रहे, तो भारतीयों की औसत आयु 6 वर्ष कम होने का खतरा हो जाएगा। इस तरह वर्तमान में संसार के सभी लोगों में जलवायु परिवर्तन वायु प्रदूषण पर्यावरण की एक महत्वपूर्ण समस्या बन गई है। पर्यावरण प्रदूषण का मूल कारण मनुष्य का प्रकृति के प्रति दुर्व्यवहार की हद पार हो गई ,मनुष्य प्रकृति का शोषक बन गया, प्रकृति के उचित दोहन को उसने ताक में रख दिया।

पर्यावरण में प्राकृतिक संसाधनों का भण्डार है। पर्यावरण अजैविक एवं जैविक घटकों से मिलकर बनता है। पर्यावरण हमेशा परिवर्तनशील है। इसमें निहित भौतिक , रासायनिक, सामाजिक, नैतिक ,संस्कृतिक, भावात्मक, आर्थिक एवं सामाजिक शक्तियों को पर्यावरण का अंग माना गया है । पर्यावरण का प्रभाव प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों दशाओं में दिखता है।

आने वाली पीढ़ी के लिए जो पृथ्वी, जलवायु, वनस्पति और आकाश हम छोड़ कर जाएंगे , क्या वह उपयोग लायक रहेंगे? यही कारण है, कि दुनिया की बागडोर संभालने वाले नेताओं को अपने आसपास के पर्यावरण की कुछ चिंता हुई थी । इस विश्वव्यापी चिंता की अभिव्यक्ति जब हुई, तब ब्राजील की राजधानी रियो दी जनीरो में 3 जून से 14 जून 1992 तक आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन विकास जो पृथ्वी सम्मेलन के नाम से विख्यात हुआ है। *पर्यावरण का मुख्य आधार वन क्षेत्र है ,जो बड़ी तेजी से घट रहा है।* मध्य प्रदेश में वन आवरण कम होने का मुख्य कारण अतिक्रमण, अवैध कटाई और गैर वानिकी की कार्यों के लिए वन भूमि देना है। वहीं प्रदेश में जल, जंगल वह जमीन का अनियंत्रित दोहन हुआ हैं। इसलिए पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ा है । किसी भी देश, प्रदेश जिले , गांव के कुल हिस्सों में से एक तिहाई में घना जंगल होना चाहिए । यदि जंगल वह अन्यत्र जगहों में है तो वहाँ इमली, बेल ,जामुन, बेर ,शहतूत गूलर, खैर, शरीफा, बडहल ,खिन्नी जैसे बहु- उपयोगी वृक्ष आज विलुप्ति की कगार पर है। अशोक ,अर्जुन ,शीशम कदॅब के पेड़ों के अलावा पीपल, बरगद,ओर पाकड़ जैसे भरपूर ऑक्सीजन देने वाले पर्यावरण हितैषी पेड़ों की संख्या भी कम होती जा रही है। पेड़ों से निकलने निकलने वाली ऑक्सीजन मानव जीवन को बचाती है। नीम, बरगद, तुलसी तथा बांस की प्रजातियां सबसे अधिक आक्सीजन देने वाले पेड़ पौधों में कहलाती है। यही पेड़- पौधों वायुमंडल के तापक्रम को कम करते हैं, वही पेड़ों से घिरी जगह पर दूसरी जगह की अपेक्षा तीन से चार डिग्री तापमान कम होता है। वास्तव में प्रतिदिन एक स्वस्थ व्यक्ति को 550 लीटर शुद्ध ऑक्सीजन की जरूरत होती है। देखा गया पीपल, तुलसी 24 घंटे ऑक्सीजन छोड़ते हैं। वही 30% से अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है बाॅस व अन्य वनपत्तियों के मुकाबले में। जलवायु परिवर्तन हमारे जीवन की सच्चाई बन चुका है ।जलवायु परिवर्तन की चुनौती का समाधान प्रकृति के पास पहले से ही मौजूद है। क्योंकि पेड़ ऑक्सीजन देते हैं ,वहीं प्रकृति के विभिन्न संसाधन जो पृथ्वी पर मानव को रहने योग्य बना रखा है, उन्हीं संसाधन से को हम नष्ट करते हैं, तो हमारा पर्यावरण असंतुलित होना स्वाभाविक है।

अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस पर इस बात पर केंद्रित होना भी आवश्यक है, कि हम किस तरह से अपने परिस्थितिकी तंत्र को दोबारा अपने प्रयत्नों व्यवहार से वापस ला सकते हैं । हम प्रकृति के नियमों को अच्छी तरह से नहीं समझते हैं ,यहां यह जरूरी है ,कि हमारी सीमाओं का ज्ञान हमें हो क्योंकि प्रकृति हमारी शिक्षा या व्यवहार का हिस्सा है । यह जरूरी है कि हमारे पूरे व्यवहार और चाल में पृथ्वी संरक्षण की बड़ी भूमिका होनी चाहिए। हम अपने परिस्थितिकी तंत्र को समझें और अपनी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाए। प्रकृति और प्रवृत्ति के प्रति हमारी समझ जितनी बेहतर होगी , हम उतना ही अपने पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर कर पाएंगे।

अब समय की पुकार यही है, कि हम देश में पर्यावरण परिरक्षण को एक जन आंदोलन बनाएं, अब देश में कार्यरत स्वयं सेवी संगठनों को संकल्प करना होगा , कि वह एकजुट होकर पर्यावरण संरक्षण का अभियान चलाएं। यह भी संकल्प लेना होगा कि पर्यावरण दिवस की सार्थकता नगरों में चमक-दमक पूर्ण जलसों के आयोजन के साथ पर्यावरण कार्यक्रमों से दूर दराज के गांव में निवास करने वाले आम आदमी को भी जोड़ने से ही सिद्ध होगी |

About The Author

'Bolo Zindagi' s Founder & Editor Rakesh Singh 'Sonu' is Reporter, Researcher, Poet, Lyricist & Story writer. He is author of three books namely Sixer Lalu Yadav Ke (Comedy Collection), Tumhen Soche Bina Nind Aaye Toh Kaise? (Song, Poem, Shayari Collection) & Ek Juda Sa Ladka (Novel). He worked with Dainik Hindustan, Dainik Jagran, Rashtriya Sahara (Patna), Delhi Press Bhawan Magazines, Bhojpuri City as a freelance reporter & writer. He worked as a Assistant Producer at E24 (Mumbai-Delhi).

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