स्वामी विवेकानंद भारतीय संस्कृति के एक ऐसे शिखर हैं, जिनकी चमक आज भी पूरे विश्व को रोशन कर रही है। वे न केवल एक महान दार्शनिक और आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि युवाओं के लिए एक अनंत प्रेरणा स्रोत भी। 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में, जब भारत ब्रिटिश उपनिवेशवाद की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति की गरिमा को पुनर्जीवित किया। उन्होंने वेदांत दर्शन को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया और युवाओं को आत्मविश्वास, साहस और सेवा भावना से ओतप्रोत किया। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था, और वे रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्य थे। स्वामी विवेकानंद का जीवन छोटा था, मात्र 39 वर्ष। लेकिन उनके विचारों की गहराई और प्रभाव इतना विशाल है कि वे आज भी लाखों युवाओं को प्रेरित करते हैं। 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में उनके भाषण ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई। उन्होंने कहा, “बहनों और भाइयों,” जो अमेरिकी श्रोताओं को इतना प्रभावित किया कि वे तालियों से गूंज उठे। यह भाषण भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिकता का प्रतीक था।
स्वामी विवेकानंद का जीवन संघर्षों से भरा था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। बचपन में वे खेलकूद और पढ़ाई में अव्वल थे। उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक किया। पश्चिमी दार्शनिकों जैसे ह्यूम, कांट और स्पेंसर से प्रभावित होने के बावजूद, वे भारतीय वेदांत की गहराई में डूबे रहे। 1881 में रामकृष्ण से पहली मुलाकात हुई, जब नरेंद्र ने पूछा, “क्या आपने ईश्वर को देखा है?” रामकृष्ण का उत्तर था, “हां, मैंने देखा है, जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूं।” इस मुलाकात ने नरेंद्र के जीवन की दिशा बदल दी। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद, विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा के क्षेत्र में कार्यरत है।
1890 से 1893 तक वे भारत भ्रमण पर निकले। इस दौरान उन्होंने देश की गरीबी, अज्ञानता और सामाजिक कुरीतियों को निकट से देखा। वे पैदल यात्रा करते, गांवों में रुकते और लोगों से बातचीत करते। कन्याकुमारी में ध्यान करते हुए उन्हें भारत के उत्थान का संदेश मिला। उन्होंने महसूस किया कि भारत की संस्कृति में छिपी शक्ति को जगाना होगा। शिकागो धर्म संसद में उनका भाषण एक मील का पत्थर था। उन्होंने हिंदू धर्म को सहिष्णुता और एकता का प्रतीक बताया, कहा कि “सभी धर्म सत्य हैं, जैसे अलग-अलग नदियां समुद्र में मिलती हैं।” इस भाषण ने पश्चिम को भारतीय आध्यात्मिकता से परिचित कराया। अमेरिका और इंग्लैंड में प्रवास के दौरान उन्होंने कई व्याख्यान दिए, योग और वेदांत पर किताबें लिखीं। 1897 में भारत लौटकर उन्होंने रामकृष्ण मठ की स्थापना की। उनका स्वास्थ्य खराब होने लगा, लेकिन वे रुके नहीं। 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में उनका निधन हुआ।
स्वामी विवेकानंद भारतीय संस्कृति के शिखर हैं, क्योंकि उन्होंने प्राचीन भारतीय दर्शन को आधुनिक रूप दिया। भारतीय संस्कृति की जड़ें वेद, उपनिषद और गीता में हैं, लेकिन औपनिवेशिक काल में यह सब दबा हुआ था। विवेकानंद ने वेदांत को पुनर्जीवित किया। उन्होंने कहा, “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” यह नारा भारतीय संस्कृति की आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। उन्होंने हिंदू धर्म को एक विज्ञान की तरह प्रस्तुत किया, जहां आस्था और तर्क का सामंजस्य है। उनका योगदान सामाजिक सुधार में भी है। वे जातिवाद, अंधविश्वास और महिलाओं की दशा के खिलाफ थे। उन्होंने कहा, “महिलाओं का उत्थान किए बिना राष्ट्र का उत्थान असंभव है।” भारतीय संस्कृति में नारी को देवी का रूप माना जाता है, लेकिन व्यवहार में वे उपेक्षित थीं। विवेकानंद ने शिक्षा और सशक्तिकरण पर जोर दिया। उन्होंने रामकृष्ण मिशन के माध्यम से स्कूल, अस्पताल और अनाथालय स्थापित किए, जो भारतीय संस्कृति की सेवा भावना को दर्शाते हैं।
विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर स्थापित किया। पश्चिम में वे हिंदू धर्म के राजदूत बने। उनकी किताबें जैसे राज योग, कर्म योग और ज्ञान योग ने योग को लोकप्रिय बनाया। आज योग अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है, जिसकी नींव विवेकानंद ने रखी। उन्होंने भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिकता पर जोर दिया, कहा कि भारत का संदेश शांति और सद्भाव है। उनकी शिक्षाएं पर्यावरण, स्वास्थ्य और मानसिक शांति से जुड़ी हैं, जो आधुनिक दुनिया की जरूरत हैं।
भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता और विज्ञान का मेल विवेकानंद की देन है। उन्होंने कहा, “धर्म विज्ञान है, और विज्ञान धर्म।” यह विचार भारतीय संस्कृति की प्राचीनता को आधुनिक बनाता है। वे राष्ट्रीयता के प्रतीक थे, जिन्होंने स्वदेशी भावना जगाई। विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति को एक जीवंत शक्ति बनाया, जो आज भी प्रासंगिक है। स्वामी विवेकानंद युवाओं के आदर्श हैं। उनका जीवन युवाओं को सिखाता है कि उम्र कोई बाधा नहीं। मात्र 30 वर्ष की आयु में उन्होंने विश्व को प्रभावित किया। युवाओं से वे कहते थे, “मेरे युवा मित्रों, तुममें अनंत शक्ति है।” यह संदेश युवाओं में आत्मविश्वास जगाता है। आज की पीढ़ी सोशल मीडिया, तनाव और अनिश्चितता से घिरी है, लेकिन विवेकानंद की शिक्षाएं मार्गदर्शन करती हैं। वे युवाओं को कर्म योग सिखाते हैं। उन्होंने कहा, “कर्म करो, फल की चिंता मत करो।” यह युवाओं को मेहनत और समर्पण का पाठ पढ़ाता है। स्टार्टअप कल्चर में युवा उद्यमी उनसे प्रेरित होते हैं। विवेकानंद ने शिक्षा पर जोर दिया, कहा कि “शिक्षा वह है जो मनुष्य को स्वतंत्र बनाती है।” वे चाहते थे कि युवा पढ़ें, सोचें और समाज की सेवा करें। रामकृष्ण मिशन के कॉलेज युवाओं को आध्यात्मिक और व्यावहारिक शिक्षा देते हैं। वे फिटनेस पर जोर देते थे, कहा कि “शरीर स्वस्थ हो तो मन स्वस्थ।” योग और ध्यान युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य देते हैं।
आज के युवा सामाजिक मुद्दों जैसे पर्यावरण, असमानता और गरीबी से जूझते हैं। विवेकानंद की सेवा भावना प्रेरित करती है। उन्होंने कहा, “दारिद्र्य नारायण की सेवा करो।” युवा एनजीओ और वॉलंटियरिंग में सक्रिय होते हैं, विवेकानंद से प्रेरित होकर। उनकी किताबें युवाओं को पढ़नी चाहिए, जैसे मेरा भारत या व्याख्यान संग्रह”। राष्ट्रीय युवा दिवस 12 जनवरी को उनके जन्मदिन पर मनाया जाता है, जो युवाओं को समर्पित है। विवेकानंद युवाओं को राष्ट्रीयता सिखाते हैं। उन्होंने कहा, “भारत के लिए जीओ, भारत के लिए मरो।” युवा राजनीति और समाज सेवा में उनसे प्रेरित होते हैं। डिजिटल युग में उनके विचार सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं, युवाओं को मोटिवेट करते हैं। वे कहते थे, “एक विचार लो, उसे अपना जीवन बनाओ।” यह युवाओं को फोकस सिखाता है।
विवेकानंद का दर्शन वेदांत पर आधारित है। उन्होंने अद्वैत वेदांत को सरल बनाया, कहा कि “सब कुछ ब्रह्म है।” यह एकता का संदेश है, जो विभेद मिटाता है। आधुनिक दुनिया में धार्मिक कट्टरता के खिलाफ यह हथियार है। उनका कर्म योग गीता से प्रेरित है, जो सक्रिय जीवन सिखाता है। भक्ति योग में वे प्रेम और समर्पण पर जोर देते हैं। ज्ञान योग में तर्क और विवेक। राज योग में ध्यान और योगासन। स्वामी विवेकानंद भारतीय संस्कृति के शिखर हैं, जिन्होंने इसे वैश्विक बनाया। वे युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं, जो साहस, सेवा और आत्मविश्वास सिखाते हैं। उनका जीवन हमें बताता है कि एक व्यक्ति दुनिया बदल सकता है। आज के युवाओं को उनके विचार अपनाने चाहिए, ताकि भारत विश्व गुरु बने। विवेकानंद अमर हैं, उनके शब्द अनंत काल तक प्रेरित करेंगे।
'Bolo Zindagi' s Founder & Editor Rakesh Singh 'Sonu' is Reporter, Researcher, Poet, Lyricist & Story writer. He is author of three books namely Sixer Lalu Yadav Ke (Comedy Collection), Tumhen Soche Bina Nind Aaye Toh Kaise? (Song, Poem, Shayari Collection) & Ek Juda Sa Ladka (Novel). He worked with Dainik Hindustan, Dainik Jagran, Rashtriya Sahara (Patna), Delhi Press Bhawan Magazines, Bhojpuri City as a freelance reporter & writer. He worked as a Assistant Producer at E24 (Mumbai-Delhi).