
नारियों की प्रताड़ना की वजह पुरुषों की बीमार सोच है : देवी, लोक गायिका – देवी पूजा तो लोग धार्मिक भावना से करते हैं. मगर महिला होने के कारण जो प्रताड़ना वो अक्सर पुरुषों द्वारा झेलती हैं, वह पुरुषों की बीमार मानसिकता के कारण होता है. पुरुष अपने अहंकार से आहत होने पर शारीरिक रूप से कमजोर स्त्री को सताता है. यौन कुंठाओं के कारण बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देता है. भारत में बेटा और बेटी के बीच अंतर माना जाता है. यह विडंबना है कि हमारे शास्त्र तो नारी की पूजा करने को कहते हैं, पर पुरुष स्वयं को नारी का मालिक समझता है. घर में बहन ही हमेशा भाई को खाना परोस के खिलाती है. ऐसा कभी नहीं होता कि भाई भी अपनी थकी-हारी बहन को खाना परोसकर खिलाये. घर की बुजुर्ग महिलाएं भी लड़कियों को दबकर रहने की शिक्षा देती रहती हैं. इससे एक खुला और स्वतंत्र संवाद नहीं हो पाता. महिलाएं जब शिक्षित होंगी, जागरूक होंगी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होंगी तभी महिलाओं की दशा सुधर पायेगी.घर में बदलाव होगा तभी समाज बदलेगा : रतन राजपूत, अभिनेत्री – समाज में हर साल होनेवाली देवी पूजा एक प्रथा है जो बरसों से चली आ रही है. ऐसा हमारी सभ्यता–संस्कृति की याद बनाये रखने के लिए भी आवश्यक है. इसके साथ ही यह एहसास भी कराता है कि समाज की देवियां भी शक्ति यानी नवदुर्गा की प्रतीक हैं. हिन्दू धर्म के तहत अगर हम ईश्वर की बात करें तो शिव, विष्णु और कृष्ण भी पार्वती, लक्ष्मी एवं राधा के बिना अधूरे हैं. ऐसे में समाज की बात करें तो महिलाओं के दुर्व्यवहार के लिए सारे पुरुष प्रधान समाज को दोषी नहीं ठहरा सकतें. क्यूंकि समाज में कोई लड़का अगर रेप करता है तो वहीँ दूसरी तरफ बहुत से ऐसे पुरुष भी हैं जो पीड़ित हो रही नारियों को बचाते हैं. उनके हक़ के लिए लड़ते हैं. जहाँ तक समाज की देवियों की बात है तो जब एक सास अपनी बहू को जलाकर मार डालती है तो ऐसे में हम सिर्फ पुरुषों को दोष कैसे दें ? समाज की देवियों के जीवन में बदलाव तभी आएगा जब मर्द हो या औरत सभी अपनी सोच बदलेंगे. यहाँ समस्या यह है कि लोग समाज में तो नुक्स निकालने लगते हैं मगर अपने घर के अंदर की बुराई उन्हें नज़र नहीं आती. जब तक लोग अपने घर–परिवार में बदलाव नहीं लाएंगे तब तक समाज भी नहीं बदलेगा. सिर्फ बच्चों को पैदा कर देना ही माँ–बाप का कर्तव्य नहीं है, बल्कि वो क्या सोच रखते हैं, किस रास्ते पर चल रहे हैं यह देखना भी उनका कर्तव्य बनता है. ताली एक हाथ से तो नहीं बजती, इसलिए मैं एकतरफा पुरुष प्रधान समाज को इसके लिए दोषी नहीं मान सकती.
समाज में काम करने की मशीन बनकर रह गयी हैं महिलाएं : पद्मश्री सुधा वर्गीज, समाजसेविका – हमारी संस्कृति हमें हरेक महिला को देवी का दर्जा दिलवाती है. हमारे समाज के कवि, ज्ञानी समाज की महिलाओं को देवी कहते हैं. लेकिन जब हकीकत पर निगाह डालते हैं तो इन बातों की सार्थकता कम हो जाती है. महिलाएं बंधन में नजर आती हैं. वे मानसिक रूप से भी स्वतंत्र नहीं दिखती. उनके जीवन में इतना ज्यादा बंधन है कि वो सिर्फ काम करने की मशीन बनकर रह गयी हैं. घर, बच्चों और पति को सँभालने में ही उनकी ज़िन्दगी गुजर जाती है. देवी की पूजा करना बहुत आसान है मर्दों के लिए. वे देवी को खुश करने के लिए कुछ भी करेंगे. लेकिन घर की साक्षात नज़र आनेवाली देवियों को नहीं पूछेंगे. जब तक घर और मंदिर की दोनों देवियों में समाज में बैलेंस नहीं होगा तब तक सुधार नहीं होगा. ऐसा लगता है हमलोग बहुत ढोंगी हैं. सिर्फ डर से भक्ति भावना दिखाते हैं. इसलिए पूजा शुरू होते ही फिर वही वहशीपना. हमारी श्रद्धा नहीं है पूजा में. समाज के पुरुषजन पत्नी को लात मारेंगे लेकिन देवी के सामने नतमस्तक हो जायेंगे.
समाज मूर्ति को देवी मानता है लेकिन नारी को शक्ति नहीं : नवनीत शर्मा, वरीय रंगकर्मी – पुरुष प्रधान समाज की विकृति ये है कि उन्होंने मूर्ति को देवी तो माना है लेकिन नारियों को पत्नी, बेटी–बहन को देवी नहीं माना है. जबकि वस्तुस्थिति उलटी है, आज पत्नी ही घर की वास्तविक देवी है क्यूंकि वही घर को वैभवशाली एवं समृद्धशाली बनाती है. मुझे लगता है इस संदर्भ में पुरुष के पास दृष्टि ही नहीं है जो देख सके कि हकीकत क्या है. दूसरी बात यह कि यहाँ पुरुषों का अहम सामने आ जाता है. उन्होंने देवी को ठीक से समझा ही नहीं है, क्यूंकि अगर समझते तो फिर महिलाओं पर यूँ शोषण नहीं होता. यही वजह है कि उन्हें सिद्धि नहीं मिलती. अगर उनका भाव–विचार शुद्ध होता तो उन्हें समाज की महिलाओं में भी देवी नज़र आती. अगर वे समाज की नारियों को देवी का दर्जा दें तभी उनकी यह पूजा भी सफल होगी.


